कुछ खास है’, ‘हर खुशी में रंग लाए’, ‘पकड़े रहना छोड़ना नहीं’… इन अमर स्लोगन्स के पीछे का चेहरा अब खामोश; जानें उनके जीवन की अनसुनी बातें और भारतीय विज्ञापन पर उनका अमिट प्रभाव
नई दिल्ली: भारतीय विज्ञापन जगत के ‘एड गुरु’ और रचनात्मक दूरदर्शी पीयूष पांडे का गुरुवार को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके जाने से न केवल ओगिल्वी (Ogilvy) इंडिया को एक मार्गदर्शक की कमी महसूस हो रही है, बल्कि भारतीय उपभोक्ता संस्कृति ने अपनी सबसे प्यारी और जानी-मानी आवाजों में से एक खो दी है।
पीयूष पांडे सिर्फ एक विज्ञापन कार्यकारी नहीं थे, बल्कि वह एक ऐसे कहानीकार थे जिन्होंने आम लोगों की भावनाओं को समझा और उन्हें सरल, सहज भाषा में ब्रांड्स से जोड़ दिया। उनका काम इतना प्रभावशाली था कि उनके स्लोगन और जिंगल्स भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का अभिन्न अंग बन गए।
ट्रेंडिंग ब्रेकिंग न्यूज़: एक युग का अंत
ताजा खबर यह है कि पीयूष पांडे के निधन से विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री में शोक की लहर है। उनके सहयोगियों, शिष्यों और उनके काम के प्रशंसकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। उनके काम की विरासत आज भी लाखों लोगों की यादों में जिंदा है।
| तथ्य (Fact) | विवरण (Detail) |
| निधन | गुरुवार, 24 अक्टूबर 2025 |
| आयु | 70 वर्ष |
| पेशा | एड गुरु, क्रिएटिव डायरेक्टर, लेखक |
| अंतिम पद | ओगिल्वी इंडिया (Ogilvy India) के मुख्य रचनात्मक अधिकारी (CCO) |
| विरासत | भारतीय विज्ञापन जगत को हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के करीब लाना, ‘ह्यूमन टोन’ की शुरुआत। |
विज्ञापन जगत का व्याकरण बदलने वाला शख्स
पीयूष पांडे ने 1982 में ओगिल्वी से जुड़ने के बाद भारतीय विज्ञापन की दिशा ही बदल दी। इससे पहले, विज्ञापन अंग्रेजी-प्रभुत्व वाले होते थे और अक्सर पश्चिमी विचारों की नकल करते थे। पांडे ने इस ढर्रे को तोड़ा और आम भारतीय की सरल भाषा, हास्य और जीवन-शैली को विज्ञापनों में पिरोया।
उन्होंने हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के महत्व को समझा और विज्ञापनों को ऐसा बनाया जो हर घर के सदस्य को अपना लगे। उनके विज्ञापनों में सादगी थी, लेकिन संदेश की गहराई अतुलनीय थी।
पीयूष पांडे के अमर विज्ञापन अभियान (Piyush Pandey Ads)
पीयूष पांडे के कुछ काम केवल विज्ञापन नहीं थे, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दस्तावेज थे। ये वे अभियान हैं जिन्होंने ब्रांड्स को घर-घर में पहचान दिलाई:
- फेविकोल (Fevicol): “पकड़े रहना, छोड़ना नहीं” और फेविकोल की सभी प्रतिष्ठित फ़िल्में, जिनमें हास्य और देसीपन का अद्भुत मिश्रण होता था। उदाहरण: अंडा फिल्म, बस फिल्म, कुर्सी फिल्म। यह सिर्फ गोंद नहीं, बल्कि अटूट बंधन का प्रतीक बन गया।
- कैडबरी (Cadbury): “कुछ खास है ज़िंदगी में…” – यह स्लोगन न केवल चॉकलेट से जुड़ा, बल्कि खुशी, जश्न और बचपन की यादों का पर्याय बन गया।
- एशियन पेंट्स (Asian Paints): “हर खुशी में रंग लाए” – यह कैंपेन दिवाली और त्योहारों के साथ इस कदर जुड़ गया कि रंगों का मतलब ही एशियन पेंट्स हो गया।
- हच/वोडाफोन (Hutch/Vodafone): पग (Pug) वाला विज्ञापन जिसमें एक छोटा कुत्ता हर जगह बच्चे के पीछे जाता है – इसने कनेक्शन और विश्वास को एक मासूम तरीके से दर्शाया। बाद में ज़ू-ज़ू (ZooZoo) विज्ञापन सीरीज भी उनकी क्रिएटिव टीम की ही देन थी।
- केंद्र सरकार के अभियान: ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ (Mile Sur Mera Tumhara) और ‘वोट फॉर इंडिया’ (Vote For India) जैसे राष्ट्रीय महत्व के अभियानों में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
- राजनीतिक स्लोगन: भारतीय राजनीति में सबसे चर्चित और ट्रेंडिंग स्लोगन में से एक “अबकी बार मोदी सरकार” भी उनकी ही देन थी, जिसने चुनावी विज्ञापनों की दिशा बदल दी।
पीयूष पांडे की सफलता के 3 मूल मंत्र
पीयूष पांडे की सफलता किसी एक फॉर्मूले तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी सोच में थी।
| मूल मंत्र (Core Philosophy) | व्याख्या (Explanation) |
| आम आदमी की भाषा | उन्होंने जटिल शब्दों के बजाय, वह भाषा चुनी जो लोग अपने घरों में बोलते हैं। उनकी भाषा में ‘दर्द’ और ‘हास्य’ दोनों थे। |
| सरल कहानी (Simple Storytelling) | उनके विज्ञापन छोटी, गहरी और दिल को छूने वाली कहानियों पर आधारित होते थे, जिन्हें समझना और याद रखना आसान था। |
| सत्य और विश्वास | उन्होंने हमेशा माना कि विज्ञापन में सच्चाई होनी चाहिए, जिसे दर्शक महसूस कर सकें। बनावटीपन से दूरी बनाकर उन्होंने विश्वास पैदा किया। |
क्रिकेट के मैदान से विज्ञापन की पिच तक
पीयूष पांडे का जन्म राजस्थान की राजधानी जयपुर में हुआ था। विज्ञापन जगत में आने से पहले, उन्होंने क्रिकेट खेला, चाय चखने का काम किया और निर्माण कार्यों में भी हाथ आजमाया। यह विविध अनुभव ही उन्हें भारतीय जनमानस की इतनी गहरी समझ दे पाया।
वह 1982 में ओगिल्वी में शामिल हुए, जहां उन्हें अपनी सही मंजिल मिली। उनके भाई प्रसून पांडे भी विज्ञापन जगत के बड़े नाम हैं और दोनों ने मिलकर कई सफल काम किए हैं।
विरासत और प्रभाव: क्यों उनके काम को ‘मानवीय’ माना गया?
पीयूष पांडे के विज्ञापनों को ‘मानवीय’ (Human) इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे सीधे दिल से बात करते थे। वे किसी उत्पाद की खूबियाँ गिनाने के बजाय, उत्पाद के इस्तेमाल से जुड़े सुख, दुख, प्रेम, हास्य या किसी मानवीय भावना को दिखाते थे।
- उदाहारण: कैडबरी का विज्ञापन जिसमें एक लड़की क्रिकेट स्टेडियम में नाचती है, या फेविकोल का विज्ञापन जिसमें बस की सीट एक व्यक्ति को खींचकर ले जाती है – ये विज्ञापन सीधे भावना से जुड़ते थे, इसलिए उन्हें AI या किसी एल्गोरिथम से दोहराया नहीं जा सकता।
पीयूष पांडे ने न सिर्फ भारतीय विज्ञापन की भाषा बदली, बल्कि उसका व्याकरण भी बदल दिया। उन्होंने विज्ञापन को एक कला का रूप दिया, जो आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q.1. पीयूष पांडे के काम को AI-सुरक्षित क्यों माना जा सकता है?
A.1. उनके काम में ‘देसीपन’, ‘भावना’ और ‘सहज हास्य’ की गहरी समझ होती थी, जो भारतीय संस्कृति से जुड़ी है। यह मानवीय सूक्ष्मता AI के लिए दोहराना बेहद मुश्किल है, इसलिए उनके काम की शैली एक तरह से ‘मानव स्पर्श’ की निशानी है।
Q.2. ‘पीयूष पांडे’ आज भी ट्रेंडिंग विषय क्यों हैं?
A.2. उनके निधन की खबर ब्रेकिंग न्यूज़ है और उनका काम आज भी प्रासंगिक है। वे भारतीय विज्ञापन जगत के सबसे बड़े नाम थे, इसलिए लोग उनके काम और जीवन के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।
Q.3. पीयूष पांडे ने भारतीय विज्ञापन को कैसे बदला?
A.3. उन्होंने अंग्रेजी-केंद्रित विज्ञापनों को बदलकर, हिंदी और देसी भाषाओं को प्रमुखता दी। उन्होंने ब्रांड्स को सिर्फ उत्पाद नहीं, बल्कि कहानियों और भावनाओं से जोड़ा, जिससे विज्ञापन ज्यादा प्रभावी और यादगार बन गए।
अंतिम शब्द:
पीयूष पांडे चले गए, लेकिन उनके द्वारा गढ़ी गई आवाज़ें, स्लोगन और भावनाएं हमेशा भारतीय विज्ञापन के आसमान में सितारों की तरह चमकती रहेंगी। वह एक ऐसे कहानीकार थे जिन्होंने विज्ञापनों को सिर्फ बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका बना दिया। उनकी विरासत भारतीय रचनात्मकता का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।