नमस्कार भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अक्सर हम ‘नंबरों’ (Marks) की दौड़ में इतना खो जाते हैं कि बच्चों के ‘मन’ को पढ़ना भूल जाते हैं। बोर्ड परीक्षाओं का दबाव, एंट्रेंस एग्जाम्स का खौफ और पीयर प्रेशर (Peer Pressure)—ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो आज के छात्रों को अंदर ही अंदर तोड़ रही हैं।
हाल के दिनों में देश भर से, विशेषकर कोटा (Kota) जैसे कोचिंग हब से जिस तरह की दुखद खबरें (Student Suicides) सामने आई हैं, उसने सरकार और शिक्षा बोर्डों को झकझोर कर रख दिया है। इसी को गंभीरता से लेते हुए, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है।
बोर्ड ने अपने सभी मान्यता प्राप्त (Affiliated) स्कूलों के लिए एक नया फरमान जारी किया है: “अब हर स्कूल को अनिवार्य रूप से एक ‘करियर काउंसलर’ (Career Counselor) और ‘वेलनेस टीचर’ (Wellness Teacher) नियुक्त करना होगा।”
यह फैसला क्या है? इससे आपके बच्चे की पढ़ाई और मानसिक सेहत पर क्या असर पड़ेगा? और स्कूलों को अब क्या करना होगा? आइये, इस विस्तृत रिपोर्ट में हर सवाल का जवाब जानते हैं।
1. बोर्ड को यह कदम क्यों उठाना पड़ा? (The Reason Behind the Move)
यह फैसला रातों-रात नहीं लिया गया है। इसके पीछे कई गंभीर कारण हैं:
- बढ़ता हुआ अवसाद (Rising Depression): NCERT और कई मानसिक स्वास्थ्य संस्थाओं के सर्वे में पाया गया है कि कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्र भारी मानसिक दबाव में हैं।
- करियर की दुविधा: आज करियर के हजारों विकल्प हैं (YouTuber, Data Scientist, Ethical Hacker), लेकिन स्कूलों में सही गाइडेंस न होने के कारण बच्चे सिर्फ ‘इंजीनियरिंग’ या ‘डॉक्टरी’ की भेड़चाल में फंस जाते हैं और असफल होने पर निराश हो जाते हैं।
- संवाद की कमी (Communication Gap): छात्र अक्सर अपने माता-पिता या टीचर्स से अपने डर साझा नहीं कर पाते। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उन्हें जज (Judge) न करे, बस उनकी सुने।
2. नई गाइडलाइन में क्या कहा गया है? (Key Highlights of the Circular)
CBSE ने स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ‘काउंसलिंग’ अब कोई वैकल्पिक (Optional) गतिविधि नहीं है, बल्कि यह फिजिक्स और मैथ्स की तरह ही जरूरी है।
- अनिवार्य नियुक्ति (Mandatory Hiring): अब तक कई स्कूल पार्ट-टाइम काउंसलर बुलाकर खानापूर्ति करते थे। नए नियम के मुताबिक, स्कूलों को फुल-टाइम (Full Time) प्रशिक्षित काउंसलर और वेलनेस टीचर रखने होंगे।
- काउंसलिंग सेल (Counseling Cell): स्कूल परिसर में एक अलग कमरा या सेक्शन होगा, जहाँ छात्र बिना किसी झिझक के जाकर अपनी बात कह सकें।
- पेरेंट्स की भागीदारी: काउंसलर का काम सिर्फ बच्चों से बात करना नहीं होगा, बल्कि समय-समय पर माता-पिता की काउंसलिंग करना भी होगा ताकि वे बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें।
- रिकॉर्ड मेंटेनेंस: स्कूल को हर छात्र की ‘साइकोमेट्रिक प्रोफाइल’ (Psychometric Profile) का रिकॉर्ड रखना होगा, जिससे उसकी रुचि और क्षमता का पता चल सके।
एक नज़र में: क्या बदलेगा? (Summary Table)
| पहले (Earlier) | अब (Now – 2026 Onwards) |
| काउंसलिंग वैकल्पिक थी। | काउंसलिंग अनिवार्य (Mandatory) है। |
| सिर्फ बड़े शहरों के स्कूलों में सुविधा थी। | हर एफिलिएटेड स्कूल (गाँव/शहर) में होगा। |
| फोकस सिर्फ पढ़ाई पर था। | फोकस ‘मेन्टल वेलनेस’ पर भी होगा। |
| करियर गाइडेंस न के बराबर थी। | साइंटिफिक तरीके से करियर मैपिंग होगी। |
3. एक ‘काउंसलर’ आपके बच्चे की मदद कैसे करेगा? (Role of the Counselor)
बहुत से पेरेंट्स सोचते हैं कि “मेरा बच्चा पागल थोड़ी है, जो उसे काउंसलर की जरूरत पड़े?” यह सोच गलत है। एक स्कूल काउंसलर की भूमिका बहुआयामी (Multi-dimensional) होती है:
A. शैक्षणिक दबाव से निपटना (Academic Stress Management)
एग्जाम के दिनों में बच्चे घबराहट (Anxiety) महसूस करते हैं, पढ़ा हुआ भूल जाते हैं। काउंसलर उन्हें ‘स्ट्रेस मैनेजमेंट तकनीक’ और ‘एग्जाम स्ट्रेटेजी’ सिखाते हैं।
B. सही करियर का चुनाव (Career Guidance)
काउंसलर छात्रों का एप्टीट्यूड टेस्ट (Aptitude Test) लेते हैं। मान लीजिये आपके बच्चे को मैथ्स पसंद नहीं है लेकिन उसकी क्रिएटिविटी अच्छी है, तो काउंसलर उसे ‘आर्किटेक्चर’ या ‘डिजाइनिंग’ जैसे विकल्पों के बारे में बताएगा, न कि जबरदस्ती साइंस दिलाएगा।
C. भावनात्मक सहयोग (Emotional Support)
टीनएज (Teenage) में बच्चों के शरीर और मन में कई बदलाव होते हैं। बुलिंग (Bullying), दोस्तों से झगड़ा, या परिवार में कलह—इन मुद्दों पर बच्चे खुलकर काउंसलर से बात कर सकते हैं।
4. स्कूलों के लिए चेतावनी (Warning for Schools)
CBSE ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं करेगा।
- निरीक्षण (Inspection): बोर्ड की टीमें समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण करेंगी।
- मान्यता रद्द: अगर कोई स्कूल काउंसलर नियुक्त नहीं करता है, तो उसकी मान्यता (Affiliation) खतरे में पड़ सकती है या उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
5. माता-पिता को क्या करना चाहिए? (Advice for Parents)
बोर्ड अपना काम कर रहा है, स्कूल अपना काम करेंगे, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी आपकी है।
- स्कूल से पूछें: अगली PTM (पैरेंट टीचर मीटिंग) में अपने स्कूल मैनेजमेंट से पूछें—”क्या हमारे स्कूल में सर्टिफाइड करियर काउंसलर है?”
- काउंसलिंग को सामान्य बनाएं: अपने बच्चे से कहें कि काउंसलर से बात करना ‘बुखार में डॉक्टर के पास जाने’ जैसा ही सामान्य है। इसे शर्म का विषय न बनाएं।
- तुलना बंद करें: “शर्मा जी के बेटे के 98% आए” – यह तुलना आपके बच्चे के आत्मसम्मान को खत्म कर देती है। हर बच्चा यूनिक है।
निष्कर्ष (Conclusion)
दोस्तों, CBSE का यह फैसला स्वागत योग्य है। “स्वस्थ मन में ही स्वस्थ शरीर और सुनहरे भविष्य का वास होता है।” उम्मीद है कि इस कदम से हम न केवल ‘सफल छात्र’ बनाएंगे, बल्कि ‘खुशहाल इंसान’ भी गढ़ पाएंगे।
शिक्षा का मकसद सिर्फ नौकरी पाना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखना है। और इस सफर में करियर काउंसलर एक सच्चे सारथी (Guide) की भूमिका निभाएंगे।
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